Radhe Radhe
राधे राधे
*।।नित्य श्रीमद्भगवद्गीताजी के एक श्लोक को अवश्य पढेंऔर मनन करें।।* जीवन के सभी उत्तर श्रीमद्भगवद्गीता जी द्वारा
*त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।*
*कामः क्रोधः तथा लोभ स्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्* ।।16/21।।
काम, क्रोध, तथा लोभ – ये तीन नर्क के द्वार, आत्मा की अधोगति करनेवाले हैं; इस लिए इनका त्याग करना चाहिए ।
अब यह समस्त आसुरी सम्पत्तिका संक्षेप कहा जाता है। जिन कामादि तीन भेदोंमें आसुरी सम्पत्तिके अनन्त भेद होनेपर भी सबका अन्तर्भाव हो जाता है जिन तीनोंका नाश करनेसे सब दोषोंका नाश करना हो जाता है और जो सब अनर्थोंके मूल कारण हैं उनका वर्णन किया है।
*आत्माका नाश करनेवाले? ये तीन प्रकारके दोष?* नरकप्राप्तिके द्वार हैं। इनमें प्रवेश करनेमात्रसे ही आत्मा नष्ट हो जाता है? अर्थात् किसी पुरुषार्थके योग्य नहीं रहता। इसलिये ये तीनों आत्माका नाश करनेवाले द्वार कहलाते हैं। वे हैं *काम,क्रोध और लोभ* । इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये। क्योंकि ये काम आदि तीनों नरकद्वार आत्माका नाश करनेवाले हैं? इसलिये इनका त्याग कर देना चाहिये। यह त्यागकी स्तुति है।
*आप इसे ऐसे समझे कि सर्वप्रथम जो आत्मा को भी नीचा दिखाने का या नरक ले जाने का द्वार है वो है- काम -* जिसे हम आकांक्षा,अभिलाषा,लालसा,वासना,चाह,तमन्ना,मनोरथ,मरज़ी
(desire, wish, longing, aspiration, will, lust,volition, pleasure, inclination, impulsiveness,assent) भी कह सकते है अलग अलग समयानुसार । अब ये सब
किसी विषय या वस्तु को सुख का साधन समझकर(नादानी से) उसका निरन्तर चिन्तन करने से उस विषय की कामना उत्पन्न होती है।
इस कामना को हम अगर छोटा समझते है तो भूल करते है क्योंकी *इसके दोनो फल ही दुर्गुणी है*
1• *अगर अगर बाधित हो तो ।क्रोध।* आवेश, उद्धतता,अप्रसन्नता, असंतोष, नापसंदगी, नाख़ुशी, घृणा,द्वेष, डाह, ग़ुस्सा, ईर्षा, विषैलापन, अपकार, नाराज़ी, अपमान, क्रोध, रोष, उत्तेजना
(anger,fury, rage, indignation, displeasure, ragging,dudgeon, virulence, malice, despite, resentment, indignity,furore)
यदि इस कामनापूर्ति में कोई बाधा आती है? तो उससे क्रोध उत्पन्न होता है। यदि कामना तीव्र हो? तो क्रोध भी इतना उग्र रूप होता है कि वह जीवन की नौका को इतस्तत प्रक्षेपित कर छिन्नभिन्न करके अन्त में उसे डुबो देता है।
2• *अगर कामना पूर्ण हो तो और पाने की कामना। लोभ* । लालच, सिफ़ारिश, बढ़ावा, उकसावा, सानुरोध याचना, तृष्णा, कृपणता, ख़ुदग़रज़ी, स्वार्थपरता, मतलब।
(greed,cupidity,avidity,solicitation,avarice,temptation,greediness, stinginess
,rapacity,insatiability,inveiglement,self-interest)
यदि कामना पूर्ण हो जाती है तो मनुष्य का लोभ बढ़ता जाता है और इस प्रकार उसकी शक्ति का ह्रास होता जाता है। असन्तुष्टि का वह भाव लोभ कहलाता है जो हमारे वर्तमान सन्तुष्टि के भाव को विषाक्त करता है। लोभी पुरुष को कभी शान्ति और सुख प्राप्त नहीं होता क्योंकि असन्तोष ही लोभ का स्वभाव है।
स्वर्ग सुखरूप है तो नरक दुखरूप।
*अत्रैव स्वर्गः अत्रैव नर्कः।* *आशा ही परमं दुःखं नैराश्यै सर्वथा सुखम्*
अत इसी जीवन में भी मनुष्य अपनी मनस्थिति में स्वर्ग और नरक का अनुभव कर सकता है। शास्त्र प्रमाण से स्वर्ग और नरक के अस्तित्व का भी ज्ञान होता है। इस श्लोक में नरक के त्रिविध द्वार बताये गये हैं। इस सम्पूर्ण अध्याय का प्रय़ोजन मनुष्य का आसुरी अवस्था से उद्धार कर उसे निस्वार्थ सेवा तथा आत्मानन्द का अनुभव कराना है।
*क्रोध पाप का बाप है लोभ पाप का मूल*
काम, क्रोध और लोभ जहाँ काम है वहीं क्रोध का होना स्वाभाविक है। ।काम, क्रोध और लोभ के इस क्रिया प्रतिक्रिया रूप संबंध को हम समझ लें तो भगवान् का निष्कर्ष हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा कि इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
Kindly NOTE--ये *काम* यहाँ जीवन जीने की आवश्यकता, जरूरत ज़रूरी, अनिवार्य, तात्विक
(COMPULSARY NEED ,REQUIERD,necessary, essential)
के लिये नहीं है।।
इससे ज्यादा से और ज्यादा पाने के लालच की इच्छा या न पा सकने का क्रोध के लिये की इच्छा के लिये है।
याद रहे
*कर्मण्येवाधिकरस्ते मा फलेषु कदाचनः*
*Good morning wish with Warm regards* from
Vikash Vyas
*दिव्यमार्गदर्शन*
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