Radhe Radhe
राधे राधे
कल के श्लोक पर किन्ही सज्जन का प्रश्न-
ये तो ठीक है कि काम क्रोध लोभ रूपी दानव से बचें पर इसके प्रयास में बहुत समय लगेगा मुझे नहीं लगता कि मेरे पास इतना समय है??
(Its nice to get rid of these evils but needs practice for good length of time. I don't think I have that length of time left over.)
*।।नित्य श्रीमद्भगवद्गीताजी के एक श्लोक को अवश्य पढेंऔर मनन करें।।* उत्तर श्रीमद्भगवद्गीता जी द्वारा
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।18.65।।
●मन्मना भव - *मुझमे मन लगा बाकी के बहाने छोडकर (कि मेरे पास समय है ही कितना?)*
केवल मुझें सच्चिदानन्दघन वासुदेव परमात्मा में ही अनन्य प्रेम से नित्य निरन्तर अचल मनवाला हो । अर्थात् मुझ वासुदेवमें ही अपने समस्त साध्य, साधन और प्रयोजनको समर्पण करके तू मुझे ही प्राप्त होगा। यह *सर्वप्रथम जरूरी है कि मन्मना भव* मन का कार्य संकल्प करना है। अत इसका अर्थ है तुम अपने मन के द्वारा मेरी प्राप्ति का ही संकल्प करो। *श्रीशुकदेव जी ने भी परिक्षित जी को खट्वांग राजा की कथा कही कि केवल दो मुहूर्त(apprx 4 hrs.) में उन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया तुम्हारे पास तो सात दिन है अभी* । हम तो *नहीं जानते कि कितना समय बाकी है फिर भविष्य के लिये अबतक सुख साधनअर्थ संचय किस कारण से?* ?? इससे तो अच्छा ये है कि शेष समय अधिकतर नाम जप में बिताएँ अगर बडी आयु वाले हैं। छोटे हो आयु में तो भी *कल वाले श्लोक को प्रमाण मानकर विकार को जीतने की चेष्टा करते हुए ईश्वर को समर्पित हो कपट रहित कर्म करो फिर देखना ईश्वर स्वयं ही योगक्षेमं वहन करेंगे उनकी प्रतिज्ञा है।* फिर हम चिन्तित क्यूँ है?? केवल और केवल स्वार्थ सुख के लिये। *मन लगा के तो देखो यार एक बार।*
● *मद्भक्तो भव-* मुझ परमेश्वर को ही अतिशय श्रद्धा भक्तिसहित निष्काभाव से नाम गुण और प्रभाव के श्रवण कीर्तन मनन और पठनपाठन द्वारा निरन्तर भजनेवाला हो (तथा) । मद्भक्त ईश्वर की प्राप्ति का संकल्प केवल संकल्प की अवस्था में ही नहीं रह जाना चाहिए। इस संकल्प को निश्चयात्मक भक्ति में परिवर्तित करने की आवश्यकता होती है अत तुम मेरे भक्त बनो
● *मद्याजी भव* - मेरा (शंख चक्र गदा पद्म और किरीट कुण्डल आदि भूषणों से युक्त पीताम्बर वनमाला और कौस्तुभमणिधारी विष्णुका) मन वाणी और शरीर के द्वारा सर्वस्व अर्पण करके अतिशय श्रद्धा भक्ति और प्रेम से विह्वलतापूर्वक पूजन करने वाला हो । मद्याजी भक्ति प्रेमस्वरूप है। और *जहाँ प्रेम होता है वहाँ पूजा का होना स्वाभाविक है। ईश्वर जगत् का कारण होने से सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है। इसलिए ईश्वर की पूजा का अर्थ है जगत् की निस्वार्थ भाव से सेवा करना।* भगवान् श्रीकृष्ण यही उपदेश देते हुए कहते हैं? तुम मद्याजी अर्थात् मेरे,पूजक बनो जल के समान ही ज्ञान का प्रवाह ऊंची सतह से नीची सतह की ओर बढ़ता है।
● *माम् नमस्कुरु* -मुझ सर्वशक्तिमान् विभूति बल ऐश्वर्य माधुर्य गम्भीरता उदारता वात्सल्य और सुहृदया आदि गुणों से सम्पन्न सबके आश्रयरूप वासुदेव को *विनयभावपूर्वक भक्तिसहित साष्टांग दण्डवत् प्रणाम नमन समर्पण कर ।* ।मां नमस्कुरु *गर्व और अभिमान से युक्त पुरुष किसी को विनम्र भाव से प्रणाम नहीं कर सकता है। मुझे नमस्कार करो इस उपदेश का अभिप्राय कर्तृत्वादि अहंकार का त्याग करने से है* ।परमात्मा के गुणों को सम्पादित करने के लिए साधक में नम्रता,श्रद्धा, भक्ति जैसे गुणों का प्रचुरता होनी चाहिए।
एवम् -ऐसा करने से तूँ
माम् - मेरे को
एव - निश्चय ही
एष्यसि- प्राप्त होगा (यह मैं) ।ते= तेरे लिये ।सत्यम् = सत्य ।प्रतिजाने -प्रतिज्ञा करता हूँ ।(क्योंकि तूँ) । मे -मेरा । प्रियोसि - प्रिय है इस विषयमें मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा प्रिय है। कहनेका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार भगवान को सत्यप्रतिज्ञ जानकर तथा भगवत्प्राप्ति के लिए आवश्यक चार गुणों को बताकर भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वासन देते हैं तुम मुझे प्राप्त होगे।
जब कभी तत्त्वज्ञान के सिद्धांत को संक्षेप में ही कहा जाता है तब वह इतना सरल प्रतीत होता है कि सामान्य भक्त उसे गम्भीरता से समझने का प्रयत्न नहीं करते अथवा उसकी सर्वथा उपेक्षा कर देते हैं। आध्यात्मिक उपदेश देने में प्रेम की भावना ही समीचीन उद्देश्य है। *शिष्य के प्रति प्रेम न होने पर गुरु के उपदेश में न प्रेरणा होती है और न आनन्द। एक व्यावसायिक अध्यापक तो केवल वेतनभोगी होता है। ऐसा अध्यापक न अपने विद्यार्थी वर्ग को न प्रेरणा दे सकता है और न स्वयं अपने हृदय में कृतार्थता का आनन्द अनुभव कर सकता है जो कि अध्यापन का वास्तविक पुरस्कार है* ।यहाँ भगवान् स्पष्ट घोषणा करते हैं कि वे विशुद्ध सत्य का ही प्रतिपादन कर रहे हैं।।।इस श्लोक में वर्णित भक्ति से सम्पन्न कोई भी भगवत्प्राप्ति का अधिकारी बन सकता है।
तुम मुझे प्राप्त होगे यह *भगवान् श्रीकृष्ण का सत्य आश्वासन है। यही प्रतिज्ञा है कि* जब तुम मुझे समर्पित हो हर प्रकार से तब
*तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।*
*Good morning wish with Warm regards* from
Vikash Vyas
*दिव्यमार्गदर्शन*
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