राधे राधे
"मौन एक तपस्या"(silence -The Austority)
●मौनं चैवास्मि गुह्यानाम्' भगवान ने स्वयं अर्जुन से कहा है गीताजी में कि गुप्ततमों में "मौन" मैं हूँ!"
आप केवल ये न समझें कि मौन का अर्थ जैसे शाश्त्र में है अलग अलग जगह मौन रहना जैसे कि
●उत्सर्गे मैथुने चैव प्रस्रावे दन्तधावने ।
श्राद्धे भोजनकाले च षट्सु मौनं समाचरेत् ।।
(गन्दगी सफाई के काम, संभोग, दीर्घ और लघु शंका ,मञ्जन, श्राद्धकाल , भोजनकाल के छह समयावधि में मौन रहना चाहिये।)
Meaning: During cleansing processes like defaecation, urination, blowing the nose, cleaning wax from the ears, removing discharge from the eyes, etc. and also during intercourse, when one has a bleeding wound, when brushing teeth, performing religious rites for the departed (shraddha) and when eating, one should maintain silence.
या
●भद्रं भद्रं कृतं मौनं कोकिलैर्जलदागमे |
वक्तारो दर्दुरा यस्य तत्र मौनं समाचरेत ||
भावार्थ - जल से भरे हुए बादलों के आगमन पर (वर्षा ऋतु में)
कोयल नहीं कूकती है , क्योंकि उस समय यदि मेंढक टर्रा रहे हों
तो ऐसे स्थिति में उनका मौनधारण करना ही श्रेयस्कर है |
●●प्रकारान्त से इस सुभाषित का तात्पर्य यह है कि जिस सभामें अज्ञानीऔर नीच व्यक्तियों का बोलबाला हो उसमें विद्वानऔर सज्जन व्यक्तियों को चुप रहना चाहिये |)
या
●आत्मनो मुखदोषेण बध्यन्ते शुकसारिकाः ।
बकास्तत्र न बध्यन्ते मौनं सर्वार्थसाधनम् ॥
- सुभाषितरत्नसमुच्चय
(Chirpy birds like the parrot get caught in the net because of their words. (because people like to have them as pet). A duck never gets caught because it does not make any sound. Anything can be achieved by being silent).
वरन मौन रहने का अर्थ वास्तविकता में क्या है आइये समझें।
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हमारे भीतर गहरे स्तर पर आनन्दस्वरुप आत्मा है, जो हमारा निजस्वरुप है। अभी मन उसकी ओर उन्मुख न होकर, बाहर भटक रहा है और सुखाभास को सुख समझ रहा है। जब तक हम भीतर आनन्द के स्रोत को नहीं पा लेते, तब तक हम बाहर के सुख की खोज में भटकते ही रहते हैं। बाहर भोगों से आकृष्ट होकर उनमें भटकते रहने से भीतर चेतना नहीं सिमट सकती है। ध्यान के द्वारा रसमय प्रभु के साथ संबंध जुड़ जाने पर भोगैश्वर्य की प्रवृत्ति निवर्तमान हो जाती है, संस्कार भस्म हो जाते हैं और जीवन एक स्थायी सुख (आनन्द) हो जाता है। जब मन ठीक प्रकार से भीतर की ओर उन्मुख होता है, तब वह स्वयं जीवन के मूल स्रोत रस-सिन्धु की ओर तीव्रता से दौड़ता है, मानो ढलान पर दौड़ रहा हो। तब सहसा चंचल मन नीवातस्थ-दीपशिखा को भाँति स्थिर हो जाता है। गीती कहती है, 'जिस प्रकार शान्त वायु के स्थान में स्थित दीपक की शिखा चलायमान नहीं होती है, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में संलग्न योगी के जीते हुए चित्त की भी कही गयी है।' 'यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचितस्य युञ्ञतो योगमात्मनः।' (गीता, ६/ १९) जब मन ध्यान के द्वारा आनन्दस्वरुप आत्मा के सिन्धु में निमग्न होकर बाहर निकलता है, तब वह तृत्प एवं सशक्त हो जाता है। व्यक्ति को सीमित चेतना असीम चेतना के साथ जुड़कर परिष्कृत एवं दिव्य हो जाती है।
मौन की सफलता होने पर ही ध्यान की सफलता होती है। गीताजी में श्रीकृष्ण कहते हैं-' मौनं चैवास्मि गुह्यानाम्' (गीता, १०/ ३८) गुह्य रखने योग भावों में मौनभाव भी भगवान् का ही रुप है। मौन प्रभु-प्राप्ति का प्रमुख साधन है।
●महाभारत के उद्योगपर्व में सनत्सुजात धृतराष्ट्र से कहते हैं कि परमात्मा का ही नाम मौन है, क्योंकि वेद भी परमात्मा को नहीं पहुँच पाते और परमेश्वर मौन-ध्यान करने से प्रकाश में आते हैं।
"यतो न वेदा मनसा सहैनमनप्रविशन्ति ततोऽथमौनम्।
यत्रोत्थितो वेदशब्दस्तथायं स तन्मयत्वेन विभाति राजन।"(उद्योगपर्व, ४३.२)
मौन की महिमा महाभारत के उद्योगपर्व में मुहुर्मुहुः गायी गयी है:
"विदित्वेति सदाकार्य मौनं सद् ध्यानदीपकम्।निहत्य सिद्धये निन्द्यं बाह्यवाग्जालमञ्ञसा॥
यतो मौनेन दक्षाणां स्वप्नेऽपि कलहोऽस्ति न।मौनेनाशु हि म्रियन्ते रागद्वेषादयो रसाः॥
मौनेन गुणराशिश्च लभ्यते सकलागमम्।मौनेन केवलं ज्ञानं मौनेन श्रुतमुत्तमम्॥"
अर्थात् बाह्य वाग्जाल को रोककर श्रेष्ठ ध्यान के लिए दीपक के समान मौनव्रत को धारण करें। मौन धारण करने से स्वप्न में भी कलह नहीं होता है। मौनव्रत धारण करने से रोगद्वेषादि शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। मौन से गुणराशि प्राप्त होती है, मौन से ज्ञान प्राप्त होता है। मौन से केवल ज्ञान प्रकट होता है। मौन से उत्तमश्रुत ज्ञान प्राप्त होता है। गीता ने मौन की प्रशंसा की है,● "तुल्यनिन्दास्तुतिर्मोनीं।"
●"मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।"
मन की वृत्तियों के ' मौन' को ही मौन कहा जाता है। मौनी के लिए स्तुति और निन्दा भी एक समान होते है, क्योकिं वह वृत्तियों के शमन द्वारा निन्दास्तुति से ऊपर उठ जाता है।
यह कुछ नियम जरूर ध्यान में रखने चाहिये कि
●साधक मौन-ग्रहण के समय वर्तमान घटनाओं में रुचि न लें, कल की चिन्ता न करें और भविष्य में योजना भी न बनायें। ●निरन्तर रामनाम (इष्टनाम) जपने और मन में राम इत्यादि (इष्टदेव) अथवा किसी सन्त के स्वरुप पर चित्त को एकाग्र करने का प्रयत्न करें। निद्रा आ जाय, तो लेटकर सो जायें। ●मौन का उद्देश्य है-मन में व्यक्तिगत घृणा, ईर्ष्या-द्वेष और क्रोध से ऊपर उठने का संकल्प लेकर चित्त-शुद्धि करना, प्रेम तथा क्षमा को अपनाना और
●जपादि द्वारा मानसिक पवित्रता में स्थित होकर प्रभु के साथ आत्मसात् होना, आत्मसमर्पण-भाव में रहना, आध्यात्मिक प्रगति करना। यही अन्तर्मौन है।
(1) कोई कोई स्त्री पुरुषों को ऐसी आदत होती है कि बिना कारण ही बोला करते हैं उन्हें बोलने का प्रमाण कम करना चाहिये।
(2) बिना कारण (हँसी, दिल्लगी या दूसरे किसी के साथ) बोलने की इच्छा हो तब दोनों नासिका द्वारा श्वास खींच कर छाती के फेफड़ों में भर रखना और धीरे धीरे निकाल देना, भरते समय ईश्वर का ध्यान या अपने धर्म गुरु के बताये हुए मन्त्र का जाप करना।
(3) पखवाड़े भर में एक दिन सुबह या शाम को पौन घण्टे मौन धारण करना। उस समय “मेरा मन पवित्र होता जाता है” “मेरी जिन्दगी सुधरती जाती है” “व्यवहार या परमार्थ के लिये जो भी शुभकार्य करता हूँ वे सब कर्म लाभकारक होते हैं” इस प्रकार के विचार करना।
(4) ज्यादा समय मिल सकता हो तो सप्ताह में एक वक्त या 4 दिन में एक वक्त 3 से 6 घण्टे मौन रहना।
(5) मौन धारण करते समय दूध या फलों पर रहना। हो सके तो बगीचे आदि रम्य स्थान में घूमने जाना।
मौन से संकल्प-शक्ति आदि मानसिक शक्तियांए जागती हैं, किंतु ●●मौन का उद्देश्य न शक्तियां जगाना है, न उनका अभिमान करना अथवा उनका प्रदर्शन करना●●। यथासंभव मौन के समय में शांतचित होकर जप और ध्यान ही करना चाहिए। मौन से वृत्तियों के शमन के द्वारा मानसिक शांति का अभ्यास होता है। अतएव मौन के समय मन में झुँझलाहट होना अथवा दुःखी होना असंगत ही है।
प्रारंभ में मौन का अभ्यास एकान्त स्थल में तथा कुछ घण्टों तक ही करना उचित होता है।
मौनव्रती (मौन का अभ्यास करनेवाला साधक) उत्तेजना दिलाये जाने पर तथा उत्तेजना का कारण समुपस्थित होने पर भी अनुत्तेजित अवस्था में रहना जानता है। वह शान्तभाव में रहकर मन को सन्तुलित बनाये रखता है। विवेक और धैर्य उसका साथ नहीं छोड़ते हैं। वह जल्दबाजी और लापरवाही से निर्णय नहीं लेता है। वह संघर्षवेला में भी भीतर प्रशान्त रहता है। उसके मुख से गाली देनेवाले के लिए भी "भद्रं ते अस्तु " (तुम्हारा कल्याण हो), शुभकामना के ये शब्द ही निकलते हैं तथा वह अन्याय का बलपूर्वक प्रतिरोध करते हुए भी निर्वैर रह सकता है।'
●मन:प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥16॥[1]
भावार्थ -संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि-ये मन की तपस्याएँ हैं।
तात्पर्य-मन को संयमित बनाने का अर्थ है, उसे इन्द्रियतृप्ति से विलग करना। उसे इस तरह प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे वह सदैव परोपकार के विषय में सोचे। मन के लिए सर्वोत्तम प्रशिक्षण विचारों की श्रेष्ठता है। मनुष्य को कृष्णभावनामृत से विचलित नहीं होना चाहिए और इन्द्रियभोग से सदैव बचना चाहिए। अपने स्वभाव को शुद्ध बनाना कृष्णभावनाभावित होना है। इन्द्रियभोग के विचारों से मन को अलग रख करके ही मन की तुष्टि प्राप्त की जा सकती है। हम इन्द्रियभोग के बारे में जितना सोचते हैं, उतना ही मन अतृप्त होता जाता है। इस वर्तमान युग में हम मन को व्यर्थ ही अनेक प्रकार के इन्द्रियतृप्ति के साधनों में लगाये रखते हैं, जिससे मन संतुष्ट नहीं हो पाता। अतएव सर्वश्रेष्ठ विधि यही है कि मन को वैदिक साहित्य की ओर मोड़ा जाय, क्योंकि यह संतोष प्रदान करने वाली कहानियों से भरा है- यथा पुराण तथा महाभारत। कोई भी इस ज्ञान का लाभ उठा कर शुद्ध हो सकता है। मन को छल-कपट से युक्त से मुक्त होना चाहिए और मनुष्य को सबके कल्याण (हित) के विषय में सोचना चाहिए। मौन (गम्भीरता)का अर्थ है कि मनुष्य निरन्तर आत्मसाक्षात्कार के विषय में सोचता रहे। कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पूर्ण मौन इस दृष्टि से धारण किये रहता है। मन-निग्रह का अर्थ है-मन को इन्द्रियभोग से पृथक करना। मनुष्य को अपने व्यवहार में निष्कपट होना चाहिए और इस तरह उसे अपने जीवन (भाव) को शुद्ध बनाना चाहिए। ये सब गुण मन की तपस्या के अन्तर्गत आते हैं।
मौन धारण करने से लाभ।
अन्तरशक्ति बढ़ती है, महान कार्यों को कैसे करना चाहिये, वह काम शुरू करने के बाद उसका क्या परिणाम होगा, यदि विघ्न आवे तो कैसे टालना चाहिये, अटल श्रद्धा से कार्य सिद्धि आदि सन्देश हृदय में रहे हुए परमात्मा द्वारा मिलेंगे।
लाभः---
मौनधारियों के वचन सत्य होते हैं, सुनने वाले को सम्पूर्ण विश्वास तथा सचोट असर होता है। बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, चाय और अफीम वगैरह शरीर को अत्यन्त नुकसान करने वाले व्यसन के ऊपर काबू रखने की शक्ति आती है और धीरे धीरे खराब व्यसन छूट जाते हैं। अन्तःकरण, मन, बुद्धि, चित्त अहंकार में रहे हुए छह रिपु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का नाश होता है, सुख और दुःख के समय सौम्य दृष्टि व संतोषवृत्ति उत्पन्न होती है, ज्ञानेन्द्रियों की स्थिरता जाती रहती है, नाभि में रही हुई परावाणी में से शब्द गुप्त रूप से प्रकट होते हैं। वे शब्द मनुष्य (अपने) कल्याण के पन्थ में ले जाने वाली आज्ञा है अपने शरीर में से उत्पन्न होने वाले शब्दों के आधार से भविष्य में जाने वाले सुख या दुःख के समाचार मिल सकते हैं। पूर्व जन्म में कौन थे वह ज्ञात होता है। अपने सगे सम्बन्धी इष्ट मित्र मरने के बाद कहाँ (किस योनी, स्वर्ग, मृत्यु, पाताल, नरक अथवा मोक्ष) गये हैं उसकी समझ पड़ती है
संकलन, मनन एवं संपादन
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पं विकाश कुमार व्यास
●●विशेष लाभ संतत्व मुनित्व की प्राप्ति एवं इष्ट की सानिध्य प्राप्ति।●●
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